आज मैं अठारह साल का हो गया. यानि, अब कानून के अनुसार भी बच्चा नहीं रहा.
अभी भी जवान तो हूं पर.. कहीं ना कहीं मेरा बचपान छूट गया, बीते समय की धुंध में. चाहूं तो भी नहीं लौट सकता. समय अपनी क्रूर रफ्तार पर आगे बहता चलता है. हां, वह दुख भरे पल भी बीत ही जाते हैं, खो जाते हैं हमारे मन के भूले हुए किनारों में. पर उनके साथ साथ वह सुख के यादगार पल, हँसाते हँसाते रो पड़ाने वाले पल, दोस्तों के साथ पेड़ पर चड़के मिलनी वाली मासूम सी खुशी से भरे सरल से ज्यादा गहरे पल, सब समय की बेरहम लहरों में बह जाते हैं, चाहे जितनी भी कोशिश की हो उनको थामकर अपने पास रखने की. यादें बन जाती है धूल इकट्ठी करने वाली भावनाएं, जिनकी ओर कभी कभी हमारी आंखे पड़ती हैं, बहुत ही आगे बढ़कर, जब तक कि वह भावनाएं मन के कैद में नजाने कब से बंद पड़ी रह चुकी होती हैं. निकालने की कोशिश करने पर भी, उन पुरानी यादों के लिए अब की इस नई दुनिया में कहीं भी जगह नहीं होती. और फिर हमको अपने ही हाथों से अपनी प्यारी यादों को वापस अपने मन के कैद में लौटाना पड़ता है.
कहते हैं कि जन्मदिन एक खुशी मनाने का बहाना होता है. तो चलो, बहाना अपनाकर खुशियां मनाते है. और शायद मैं अभी इन सब ख्यालों के लिए बहुत ही ज्यादा जवान हूं. सिर्फ 18 साल का ही तो हूं. पुरी जिंदगी पड़ी है आगे. क्यों अभी से उम्मीद तोड़ दूं.
तो शुरू करता हूं मैं आज अपनी लड़ाई. आज तक की यादों को समय की बेरहमी से बचाने की लड़ाई. बचपन खोने के दिन, बचपना सम्हालकर रखने की लड़ाई.
09 फ़रवरी 2008
अठारह
02 फ़रवरी 2008
धार्मिक स्वतंत्रता
यह बीबीसी का लेख किसी धर्मांतरण निरोधक कानून के बारे में है. पर हाल में, मुझे धर्म के बारे में इसके पहले से ही कई सारे विचार आ रहे है जिनके बारे में मैं लिखना चाह रहा था. इस लेख के बारे में लिखकर मैं फिर अपने कुछ असंबंधित राय के बारे में भी लिख सकता हूं.
"पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की कविता श्रीवास्तव कहती हैं, 'हमें लगता है कि राज्य सरकार अपने हिंदूवादी एजेंडे पर काम कर रही है, हमें ऐसा कोई कानून मंजूर नहीं जो किसी की धार्मिक आज़ादी पर प्रहार करता हो. ऐसा करना अनैतिक और मानवाधिकारों के विरुद्ध होगा'."
पूरी कहानी यहां
धर्मांतरण निरोध? मुझे तो पहले यकीन ही नहीं हुआ कि कोई लोकतांत्रिक सरकार ऐसा करने के बारे में सोच भी सकती है. थोड़ा और सोचा तो याद आया कि मैंने पाठशाला में कुछ लेख पड़े थे जिनमें लिखा था कि वैश्वीकरण के जवाब में दुनिया भर राष्ट्रीयता की लहर फैल रही है. पश्चिम को छोड़कर, दुनिया में बाकी सारी जगह लोग अपने मूल धर्म, मूल सिद्धांत, मूल परंपराओं को कसकर थाम रहे हैं ताकि वैश्वीकरण होते होते उनका पश्चिमीकरण भी ना हो जाए. पश्चिम में मैं यूरोप के बारे में तो नहीं जानता पर अमरीका में चरमपंथी ईसाई धर्म की लोकप्रियता भी बढ़ रही है - लोगों का मानना है कि समाज दुराचारी, अधार्मिक होई जा रही है. इस "अधर्मीकरण" (नया शब्द?) को रोकने के लिए, उसे पलटने के लिए, चरमपंथियों के विचार लोकप्रिय हो रहे है. यह बात याद आई तो इस कानून का कारण समझ में आने लगा.
कारण समझ में तो आ गया पर... मैं भी कविता श्रीवास्तव जी से सहमत हूं. मेरा भी मानना है कि धर्म और सरकार के मिलने में कोई सुफल हो ही नहीं सकता. अगर हिंदी में इस विचार का कोई सही नाम है तो माफ करना, पर जब तक कि कोई मुझे वह सही नाम नहीं बताता मैं इस विचार का नाम "धर्म-सरकार अलगाव" रख रहा हूं.
अमरीका में ईसाई धर्म प्रचलित है. मध्यपूर्व में इस्लाम प्रचलित है. उन धर्मों के विश्वास करने वाले लोगों का मानना होता है कि सिर्फ उनका धर्म सही है. उनका मानना है कि बाकी के धार्मिक मार्ग इन्सानियत को नरक पहुंचाएंगे. इन विचारों के अनुसार, धर्म और सरकार के मिलन के पीछे एक धार्मिक कारण है. (मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ऐसे विश्वास ठीक है पर, वह बात बाद में.)
पर.. हिंदू या बौद्ध धर्म हो तो धर्म और सरकार के मिलन के लिए मुझे कोई कारण नहीं दिखाई देता. इन धर्मों का मानना होता है कि कोई भी धर्म हमको मोक्ष या निर्वाण तक पहुंचा सकता है. अगर समाज के प्राथमिक धर्म में ऐसा विश्वास हो तो.. धार्मिक आज़ादियों पर प्रतिबंधों का चर्चा भी कैसे उठ सकता है. धर्म के अनुसार, धर्म-सरकार अलगाव की आवश्यकता स्पष्ट है. उनके मिलन का कोई धार्मिक कारण है ही नहीं. इस लिए उपर्युक्त लेख की कहानी जैसी कहानियों को सुनकर मेरे मन में अविश्वास के बाद गुस्सा उठता है. पहले तो "हिंदूवादी" कहलाया जाना, और फिर हिंदू धर्म के एक बुनियादी विश्वास का अपमान करके लोगों की धार्मिक आज़ादियों पर प्रतिबंध लगाना..
हिंदू या बौद्ध धर्म जैसे सहनशील धर्मों के नाम धार्मिक आज़ादियों पर प्रतिबंध लगाना तो बकवास की एक नई हद पार कर जाता है, पर ईसाई धर्म जैसे धर्मों के नाम भी ऐसा करना ठीक नहीं है. समाज की प्रगति केवल विचारों की अप्रतिबंधित धार द्वारा संभव है. मैंने वाक-स्वतंत्रता के बारे में एक प्रविष्टि लिखी हुई है पर.. धार्मिक स्वतंत्रता भी उसही तरह आवश्यक है. अगर सरकार अपने नागरिकों पर जोर डालकर उनको किसी विचार में विश्वास करवाए तो वह आवश्यक विचारों की धार पर प्रतिबंध आ जाता है और समाज की प्रगति टल जाती है.
मेरा मानना है कि सिर्फ एक धर्मनिरपेक्ष सरकार सफल हो सकती है. किसी भी धर्म का सरकार से मिलने से समाज का नुकसान होगा, चाहे वह धर्म मेरा भी क्यों ना हो.
मेरी इस प्रविष्टि से शायद यह सवाल या यह ख्याल उठता होगा कि क्या मैं हिंदू हूं. इस सवाल का उत्तर कुछ लंबा और उलझनदार सा है. तो वह उत्तर किसी और दिन के लिए छोड़ देता हूं. अभी के लिए मैं बस इतना ही कहूंगा कि मैं हिंदू घराने में पला-बढ़ा हूं तो मुझपर हिंदू धर्म का प्रभाव तो स्पष्ट है, पर धर्म के बारे में मैंने अपने "धार्मिक" विचार काफी हद तक खुद रचे है और मुझे लगता है कि वह विचार कुछ अनोखे से है.
01 फ़रवरी 2008
बेजवाब
लोग क्या क्या करते हैं...
पूर्वी जर्मनी की एक ट्रैवेल एजेंसी ने दुनिया की पहली ऐसी हवाई उड़ान का आयोजन किया है जिसमें सभी लोग कपड़े उतार कर शामिल होंगे.
पूरी कहानी यहां
मेरे पास शब्द ही नहीं हैं.
31 जनवरी 2008
नींद की अनंत कमी
मैं अभी अपनी संगणक विज्ञान की कक्षा में बैठकर ऊब रहा हूं.
मुझे कुछ दिन पहले एहसास हुआ कि मैं अपने आप को पूरी तरह कभी भी सोने नहीं देता हूं. सुबह कक्षा हो तो उठना पड़ता है - उन दिनों मेरी ज्यादा से ज्यादा 6-7 घंटे की नींद होती होगी. लेकिन बाकी छात्रों की भी इतनी ही नींद होती होगी, तो उस हिसाब से मैं कुछ अलग नहीं हूं. पर सप्ताहांत को भी, प्रबोधन घड़ी लगाकर मैं अपने आप को 12 बजे से पहले उठा देता हूं. तब भी 7-8 घंटे की नींद से ज्यादा नहीं होती है. वेशेषज्ञों का कहना है कि मेरी उम्र के लोगों को 9 घंटे की नींद की जरूरत होती है, जो कभी मेरे लिए पूरी तो होती है नहीं. यह मेरी नींद की अनंत कमी... पता नहीं मेरी सेहत पर कैसा प्रभाव करेगी.
ऊकर अब मुझे कक्षा में नींद आ रही है. सोते सोते मुझे प्राध्यापक का वयाख्यान गाने जैसा सुनाई दे रहा है...
29 जनवरी 2008
पुनः पुनर्जन्म?
मैं पहले भी यहां लिखने की आदत बनाने की कोशिश कर चुका हूं.. पर कर नहीं पाया. अब फिर से कोशिश करने लगा हूं. शायद इस बार आदत टिकी रहे?
आदत बनाने की कोशिश में मैंने इस चिट्ठे का प्रारूप बदल डाला. सोचा कि अगर मुझे चिट्ठा देखना पसंद आए, तो शायद मेरा कुछ ना कुछ लिखने का भी मन करें.
चलो अभी के लिए इतना ही काफी हैं. आज-कल मेरी कुछ मध्यावधि परीक्षाएं चल रही हैं पर अगर आज रात को समय मिलता है तो कुछ और लिखूंगा.
27 अक्टूबर 2007
हिंदी विकास
यह शायद कुछ नया तो है नहीं । मैंने खुद ही इस पर बहुत लेख पढ़ें हैं और मैं यहां अमरीका में रहता हूं । पर फिर भी, अपना राय अपने शब्दों में लिखने से अपना ही आराम मिलता है ।
शायद सभी हिंदी बोलने वालों को पता होगा कि भारत में अंग्रेजी का प्रभाव बहुत ताकतदार है और इसके कारण हिंदी का अाधुनिकीकरण कुछ ... रुका-रुका सा है । और मुझे ठीक से समझ में नहीं आता कि भारत अपनी राष्ट्रभाषा की विकास में ज्यादा ध्यान क्यों नहीं देता । बाकी हर देश की भाषाओँ को, खास तौर पर भारत जैसी बड़ी, महत्वपूर्ण देशों की भाषाओँं को विश्व स्तर पर पहुंचा लिया गया है । कोरियाई जैसी भाषाओँ को राष्ट्रभाषा बने हिंदी जितना ही समय हुआ होगा । पर अगर हिंदी और कोरियाई की तुलना की जाएं तो साफ दिखाई देगा कि कोरियाई हिंदी से काफी ज्यादा आधुनिक है । विज्ञान हो, प्रौद्योगिकी हो, चिकित्सा हो ... कोरियाई में किसी भी क्षेत्र में संपूर्ण शिक्षा पाई जा सकती है । हिंदी में तो बुनियादी विषय सिखाने में भी मुश्किल हो जाती है । सच बोलूं तो मुझे अमरीका में रहने के बावजूद इस बात से शर्म आती है । क्यों भारतीय लोगों को एक भारतीय भाषा की जगह एक विदेशी भाषा ज्यादा आसान लगती है ... इस सवाल का जवाब तो मैं सोच भी नहीं सकता ।
अब यह भी सवाल उठता है कि क्या किया जा सकता है । सबसे आसान सुझाव तो यह होता कि सरकार कुछ करें । कानून द्वारा हिंदी का प्रसार बढ़ाएं । लेकिन ... भारतीय राजनीति की मेरी जानकारी कम ही है पर ... मुझे नहीं लगता सरकार कुछ कर सकती है । भ्रष्टाचार, पार्टियां ... समस्याओं का कोई अंत नहीं है । भारत के विकास का मूल है उसकी जनता, उसकी समाज । और हिंदी का विकास भी समाज द्वारा ही संभव है । पर कानूनी परिवर्तन तो फिर भी आसान होते हैं । सामाजिक परिवर्तन में समय बहुत लग सकता है, और तब भी कोई निश्चय नहीं होता ।
और कैसे किया जा सकता है भारतीय समाज को प्रभावित ? खास तौर पर मैं, अमरीका में रहता एक 17 साल का लड़का जिसकी हिंदी वैसे ही कमजोर है ... मैं क्या कर सकता हूं । मेरा मन तो करता है कि मैं हिंदी में चिकित्सा पढ़ूं, जीव-अभियंत्रिका पढ़ूं ... कम से कम अपने Mac OS X के अंतराफलक को हिंदी में कर सकूं । पर नहीं कर सकता । मैंने अकेले Mac OS X का अनुवाद करना शुरू किया पर ... काम बहुत लंबा है । मैं अकेला नहीं कर सकता । फिर मैं थोड़े दिन के लिए छोड़ देता हूं, जब तक कि मुझे फिर न याद आ जाता कि कितना अच्छा होता अगर मेरा संगणक हिंदी में होता ।
एक दिन ... शायद मुझे ही अपनी हिंदी सुधारके ऐसे काम करने होंगे । आखिरकार, समाज को बदलने के लिए थोड़े ही किसी के पास वक्त होता है । पर फिर भी, मैं चाहता हूं कि मैं एक दिन हिंदी को एक हर ओर से संपूर्ण भाषा के रूप में देख सकूं ।
08 अक्टूबर 2007
वाक्-स्वातंत्र्य
तो आज-काल ज़ैंगा ने "Featured Question" शुरू किया है । रोज, वह एक चुनिंदा सवाल प्रकाशित करते हैं और चिट्ठकों को जवाब देने का मौका मिलता है । मैं सोच रहा हूं कि कभी-कभी अगर कोई रोमांचक सवाल हो जिससे मेरा खून खौले (या फिर सिर्फ़ कोई ऐसा सवाल हो जिसके जवाब में मेरा कुछ कड़े राय हो), तब मैं यहां आकर अपना जवाब लिखूंगा ।
तो आज का सवाल :
"क्या वाक्-स्वातंत्र्य पर कभी भी कोई रोक लगनी चाहिए ? क्यौं ?"
मेरे हिसाब से मेरे राजनीतिक राय "वामपंथी" कहलाए जाते होंगे । स्वतंत्रताओं और अधिकारों के मामले में मुझे नहीं लगता कि सरकार को कभी भी अपने नागरिकों से वाक्-स्वातंत्र्य जैसे मूल्य अधिकार छीनने का कोई हक प्राप्त है । सच तो यह है कि लोकतांत्रिक सरकारों का एक बुनियादी कार्य इन ही अधिकारों की रक्षा करना है ।
पर, अप्रतिबंद्ध वाक्-स्वातंत्र्य पाकर भी शायद समस्याएं नष्ठ नहीं होती । इस दुनिया में, अच्छे लोग तो काफ़ी हैं पर फ़िर भी, बुरे लोगों की कोई कमी तो है नहीं । अप्रतिबंद्ध अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के अनुसार, भेदभाव करनेवालों को अपनी नफ़रत फ़ैलाने का पूरा अधिकार होगा । इसके अलावा, संयुक्त राज्य में आम दौर पर वाक्-स्वातंत्र्य की रोक लगाने कि लिए एक उदाहरण दिया जाता है कि, क्या लोगों को भरे हुए चलचित्रघर में "आग" चिल्लाने का अधिकार होना चाहिए ? और अमरीकी न्यायिक पूर्ववृ्त्त का कहना है कि, नहीं, ऐसे चिल्लाने से लोगों को खतरे में डालना सही नहीं है ।
सिर्फ़ इस उदाहरण को देखो तो शायद मैं भी इसके नतीजे से सहमत हूं पर ... ऐसी न्यायिक पूर्ववृत्त के अनुसार निर्णय लेने में भी खतरा है । जनता के लिए क्या "खतरा" है, यह फैसला लेने का अधिकार किसको दिया जाएं ? मैं यहां अमरीका में ही ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं तो मुझे यहां का ही ज्यादा पता है पर ... अमरीकी इतिहास मे एक समय "Red Scare" कहलाया जाता है । इस समय में वामपंथियों के विरुद्ध, खास तौर पर साम्यवादियों के विरुद्ध, बहुत भेदभाव हुआ । उस समय में वामपंथी राय भी खतरे माने जाते थें । मेरे मानना है कि यह हर दृश्य से गलत है । राजनीतिक राय के खिलाफ़ भेदभाव करने का कोई तुक नहीं बनता । संविदान प्राप्त वाक्-स्वातंत्र्य के पीछे अगर कोई एक मतलब था, तो वह कम से कम राजनीतिक राय की सुरक्षा करना है । नहीं तो सरकारी शक्ति के नीचे हर किसी भिन्नमतावलंबी की आवाज़ पिचक जाएं । इस लिए, मेरा मानना है कि, मनुष्यों की इस सदोष दुनिया की सीमाओं के भीतर, जितनी कड़ी वाक्-स्वातंत्र्य संभव है, उतनी ही कड़ी स्वातंत्र्य को स्थापित करना हमारा आदर्श है ।